सबसे बुनियादी प्रकार की खगोलीय तस्वीरें मानक कैमरों और फोटोग्राफिक लेंसों के साथ एक निश्चित स्थिति में या एक तिपाई पर लगाई जाती हैं। कभी- कभी शॉट में अग्रभूमि वस्तुओं या भूदृश्यों की रचना की जाती है। चित्रित वस्तुएं नक्षत्र, दिलचस्प ग्रह विन्यास, उल्का और उज्ज्वल धूमकेतु हैं।
खगोलीय फोटोग्राफी क्या है?
यह फोटो प्लेट दूरदर्शी के नेत्रक (eye-piece) के स्थान पर और अभिदृश्यक के फोकस -तल (focal plane) पर लगा होता है। ऐसे दूरदर्शी के लिए अभिदृश्य का चयन पूर्त्य उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया जाता है। अकाशीय पिंडों की धूमिलता के कारण द्रुत कैमरे का ही प्रयोग किया जाता है।
खगोलीय पिंडों के अध्ययन में फोटोग्राफी का विशेष महत्वपूर्ण स्थान है। इसके दो कारण हैं--एक तो यह कि फोटोपायस (photographic emulsion) की प्रकाश ग्रहण करने की क्षमता के कारण अत्यंत मंद ज्योतिवाले पिंडों का भी स्पष्ट चित्र पर्याप्त उद्भासन देकर प्राप्त किया जा सकता है। दूसरा यह कि फोटोग्राफ द्वारा प्राप्त चित्र स्थायी होते हैं और उन्हें सूक्ष्म अध्ययन के हेतु सुरक्षित रखा जा सकता है। अत्युक्ति न होगी यदि कहा जाय कि फोटोग्राफी की कला के अभाव में आधुनिक ज्योतिर्विज्ञान का विकास इतनी दूर तक कभी संभव न होता ।
खगोलीय फोटोग्राफी का इतिहास क्या है।
लई डागेयर (Louis Daguerre) द्वारा सन् 1839 में फोटोग्राफी का आविष्कार होने के उपरांत 23 मार्च 1840 को न्यूयार्क के जॉन विलियम ड्रेपर (john W. Draper) ने 20 मिनट का उद्भासन देकर चंद्रमा का फोटो लिया। किसी खगोलीय पिंड का यह प्रथम फोटो चित्र था। इसके लगभग साढ़े नौ वर्ष बाद, 18 दिसम्बर 1849 को, बोस्टन के कुछ उत्साही फोटोग्राफरों ने एक नई विधि का अनसरण कर चंद्रमा का एक नक्षत्रों का फोटोचित्र लेने की दिशा में हार्वर्ड वेधालय अग्रणी बना। अभिजित नक्षत्र (Vega) का एक चित्र 17 जुलाई 1850 को लिया गया।
सन 1870 में कैप्टेन ऐब्नी (Capt W. de W. Abney) ने एक विशेष प्रकार के फोटोग्राफिक पायस (emulsion) का आविष्कार किया जो लाल रंग के प्रकाश के लिये अत्यंत सुग्राही था। उस पायस से युक्त पट्टिका पर उन्होंने वर्णक्रम (spectrum) के अवरक्त (infrared) क्षेत्र में सूर्य का एक स्पष्ट चित्र प्राप्त किया । ऐब्नी का आविष्कार खगोलीय फोटोग्राफी के क्षेत्र में सचमुच एक क्रांति थी। इसी के द्वारा सन 1870-74 में डॉ॰ गाउल्ड (Fould) ने दक्षिणी गोलार्ध के अनेक प्रमुख युग्म (binaries) तारों के चित्र लिए। इसके बाद विलियम हिगिंज़ (William Higgins) ने आधुनिक श्लेष पट्टिका (gelatine plates) का आविष्कार किया, जिसने खगोलीय फोटोग्राफी की पद्धति को भी सामान्य फोटोग्राफी की भाँति सुगम एवं आडंबरहीन बना दिया।
फोटोग्राफी का परिचय
यह ज्ञातव्य है कि कोई नक्षत्र सभी रंगों के लिये समान रूप से दीप्तिमान नहीं होता। इसलिए विभिन्न प्रकार के फिल्टरों और फोटोग्राफिक पायसों का योग कर विभिन्न वर्णों के क्षेत्र में उनका कांतिमान ज्ञात किया जाता है। इससे उनकी रचना, ताप, धरातल, घनत्व तथा वायुमंडल आदि के संबंध में अनेक अमूल्य जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। सन् 1924 में मंगल के तथा 1927 में वृहस्पति के जो फोटोचित्र लिक (Lick) वेधालय की ओर से डब्ल्यू. एच... राइट (W. H. Wright) ने वर्णपट के अवरक्तक्षेत्र में लिए थे, उन चित्रों की वृहस्पति के सामान्य विधि से लिए गए फोटो चित्रों से तुलना करने पर जो विशेष अंतर अथवा विभिन्नता दृष्टिगोचर हुई उससे उन पिंडों के धरातल एवं वायुमंडल के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हुई। सूर्य के डिब्बे (सौर कलंक, sun spots), सौर वर्णपट इत्यादि के चित्रों का अध्ययन करने पर उन कलंकों में चुंबकीय क्षेत्रों का अस्तित्व तथा सूर्य में होलियम, सोडियम आदि तत्वों की प्रचुरता का पता चला है।
आकाशीय पिंडों की दूरी बहुत ही विशाल होती है और पृथ्वी के समीपस्थ तारों को छोड़कर शेष कोरी आँखों से नहीं दिखलाई पड़ते। इस कारण उन तारों के चित्र सामान्य कैमरों से नहीं खींचे जा सकते।
बहुत से तारे हमसे अपरिमित दूरी पर होने के कारण परस्पर अत्यंत पास पास अथवा सटे सटे से दिखलाई पड़ते हैं, यद्यपि उनके बीच की दूरी अरबों खरबों मील से भी कहीं अधिक होती है। इसके अतिरिक्त द्विदैहिक या युग्मक तारों (binaries) की भी अत्यधिक संख्या आकाश में छिटकी पड़ी है। सामान्य कैमरे से उन्हें पृथक् कर सकना संभव नहीं होता, क्योंकि इन कैमरों के लेंसों की विभेदनक्षमता (solving power) अत्यंत सीमित होती है।
सुदूरस्थ तारों की मंदता के कारण पर्याप्त दीर्घकालिक उद्भासन (exposure) देना पड़ता है, जो कभी कभी कई घंटों तक का होता है।
खगोलीय कैमरे का आरोपी
पृथ्वी के घूर्णन के कारण गतिमान प्रतीत होनेवाले आकाशीय पिंडों का चित्र लेने के लिए कैमरे के दूरदर्शी को इस प्रकार आरोपित करते हैं कि वह घटीयंत्र (clock work) की सहायता से पिंडों की आभासी गति की दशा में चलता रहे, जिससे उद्भासन काल में वस्तु से आनेवाली किरणें फोटो पर बिंब के स्थान पर ही पड़ती रहें और इस प्रकार बिंब पट्टिका पर जमा रहे। इसके लिए कैमरे को एक विशेष विधि से आरोपित कर देते हैं जिसे विषुवत् आरोपण ( equatorial mounting) कहते हैं। इसमें दो परस्पर लंबवत् घूर्णाक्ष (axes of rotation) होते हैं---एक तो पृथ्वी के अक्ष के समांतर, जिसे ध्रुवीय अक्ष कहते हैं और दूसरा इसके लंवबत् जिसे दिक्पात अक्ष (declination axis) कहते हैं। सर्वप्रथम दूरदर्शी को किसी विद्युन्मोटर द्वारा खगोलीय विषुवत् वृत्त (celestial equator) के उत्तर या दक्षिण की ओर लक्ष्य तारे के दिक् पात के बराबर घुमाते हैं और क्रांति कोण यंत्र को इस प्रकार क्लैंप (शिकंजे) में कस देते हैं कि वह उत्तर या दक्षिण की ओर हट बढ़ न सके। इस कारण अ दूरदर्शी केवल विषुवत्वृत्त के ही समांतर घूम सकता है। यही वह रेखा होगी जिसपर वह तारा चलता हुआ आभासित होगा।
घड़ी नियंत्रण
पृथ्वी के घूर्णन के कारण समस्त आकाशीय पिंड पूर्व से पश्चिम की के ओर गमन करते हुए प्रतीत होते हैं। इस कारण यदि किसी आकाशीय पिंड का फोटो लेते समय कैमरे को लक्ष्यपिंड की ओर निर्दिष्ट करके छोड़ दिया जाय, तो उक्त पिंड के आभासी स्थानांतरण के कारण उसका फोटो चित्र स्पष्ट नहीं प्राप्त होगा, वरन् वह बिंदु सदृश पिंड एक छोटी और मोटी रेखा के रूप में फोटो पट्टिका पर दृष्ट होगा और इस रेखा की विमितियाँ भी स्पष्ट अथवा तीक्ष्ण नहीं होंगी।
समग्रता से कुछ मिनट पहले और बाद में एक आयोडीनयुक्त प्लेट को कैमरे में पतली अर्धचंद्र की रोशनी में उजागर किया गया था, और एक अलग छवि प्राप्त की गई थी, लेकिन समग्रता के दौरान दो मिनट के लिए कोरोना के प्रकाश के संपर्क में आने वाली एक और प्लेट में थोड़ी सी भी कमी नहीं दिखाई दी। फोटोग्राफिक कार्रवाई का निशान । चांदी के ब्रोमाइड से तैयार कागज की एक शीट पर दो मिनट के लिए एक लेंस द्वारा संघनित कोरोना के प्रकाश के कारण कोई फोटोग्राफिक परिवर्तन नहीं हुआ था।
इस कठिनाई को दूर करने के लिये ऐसी व्यवस्था की गई है कि खगोलीय पिंडों का फोटो लेनेवाला कैमरा एक विद्युतचालित घड़ीयंत्रनियंत्रण- व्यवस्था (Clockwork regulation mechanism) द्वारा तारों की आभासी गति की ही दिशा में तथा उनके आभासी कोणीय वेग के समान वेग से घुमाया जा सके, ताकि लक्ष्य पिंड का बिंब फोटो पट्टिका के एक ही स्थान पर 'जमा', अर्थात् 'स्थित', रहे ।
इसलिए प्रेक्षक को एक अन्य दूरदर्शी से तारे को देखते रहना पड़ता है और उसकी सहायता से कैमरे के दूरदर्शी को हाथ से घुमाकर इस प्रकार समयोजित करना पड़ता है कि किरणें फोटो पट्टिका पर बिंब के स्थान पर ही एकत्र होती रहें।
लोगों द्वारा पूछे गए प्रश्नों
एस्ट्रोफोटोग्राफ़ी शुरू करने के लिए मुझे क्या चाहिए?
डिजिटल फोटोग्राफी के आधुनिक युग में विस्तृत क्षेत्र की एस्ट्रोफोटोग्राफी अब लगभग किसी की भी पहुंच में है। उपकरण के लिहाज से, आपको बस एक आधुनिक डीएसएलआर कैमरा चाहिए जिसमें अच्छी कम रोशनी की क्षमता, एक तेज लेंस और एक अच्छा मजबूत तिपाई हो। यह आपको अच्छी गुणवत्ता वाली रात के आसमान की तस्वीरें लेने में मदद करेगा।
खगोल फोटोग्राफर क्या करते हैं?
एक एस्ट्रोफोटोग्राफर के रूप में, आप अनिवार्य रूप से ऐसी किसी भी चीज़ की तस्वीरें ले रहे होंगे जो पृथ्वी पर नहीं है। अनिवार्य रूप से एस्ट्रोफोटोग्राफी के दो मुख्य प्रकार हैं, गहरे अंतरिक्ष से वस्तुओं की छवियां जो दूरबीनों के माध्यम से ली जाती हैं, और रात के आकाश के बड़े पैमाने पर हिस्से की तस्वीरें।
क्या आप एक सामान्य कैमरे से एस्ट्रोफोटोग्राफ़ी कर सकते हैं?
नक्षत्रों और ग्रह संयोजनों के बुनियादी, विस्तृत क्षेत्र के शॉट्स के लिए, आपको टेलीस्कोप की भी आवश्यकता नहीं है - बस एक कैमरा जो लगभग 8 से 15 सेकंड तक एक्सपोज़र बनाने में सक्षम है और इसे स्थिर रखने का एक साधन है, जैसे तिपाई। चूंकि सभी नियंत्रण कैमरे पर ही होते हैं, इसलिए आपको फील्ड में कंप्यूटर की आवश्यकता नहीं है।
एस्ट्रोफोटोग्राफ़ी कितनी कठिन है?
हालांकि एस्ट्रोफोटोग्राफ़ी एक बहुत ही आसान शौक है जिसमें एक साधारण स्तर पर शुरुआत करना, इसके उच्चतम स्तर पर महारत हासिल करना मुश्किल हो सकता है। यदि आप वास्तव में इसमें अच्छा होना चाहते हैं तो आपको शिल्प सीखने में समय व्यतीत करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इसे आप निराश न होने दें।
क्या एस्ट्रोफोटोग्राफी एक करियर हो सकता है?
एक एस्ट्रोफोटोग्राफर बनना इसलिए, यदि आपके छात्र प्रकाशिकी, डिजिटल सेंसर, इमेजिंग प्रोसेसिंग सॉफ्टवेयर पर तकनीकी विषयों का अध्ययन करना पसंद करते हैं और वे विवरण पर ध्यान देते हैं और फोटोग्राफिक रचना के लिए कलात्मक दृष्टि रखते हैं, तो यह करियर उनके लिए विकल्प हो सकता है!